नवाबों के शहर लखनऊ की मक्‍खन मलाई का टेस्ट लेना न भूलें

दोस्तों, सर्दियों के मौसम में रजाई से निकलना शयाद कि‍सी का जी नहीं करता होगा, लेकि‍न लखनऊ की गलि‍यों में सुबह-सबह जब फेरीवाले की आवाज जैसे ही कानों में मक्‍खन मलाई, मक्‍खन मलाई आके गूंजती है, तो उस वक़्त आलस फ़ौरन दूर हो जाती है, नाम सुनते ही घर के अंदर से ही मुंह में पानी आने लगता है, और लोग रज़ाई छोड़ बाहर निकल कर मक्‍खन मलाई वाले के पास पहुंच जाते हैं, और देखते ही देखते उसके पास भीड़ जमा हो जाती है, यहाँ तक कि थोड़े ही समय में पूरी बकेट खाली भी हो जाती है।

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दरअसल, ओस से भी हल्‍की मुंह में घुल जाने और ज़बान को नवाबी स्वाद देने वाली मक्‍खन मलाई का स्‍वाद अगर जीभ एक बार चख ले लेती है फिर तो दोबारा भूल ना मुश्किल हो जाता है, देखने मे तो हल्‍की होती ही है, मगर इतनी ठोस होती है कि अगर सौ ग्राम खा लिया जाए तो पेट इतना भारी हो जाता है, और अहसास ऐसा यही इसकी खासियत है।

यही तो खासि‍यत जनाब लखनऊ की यहाँ रहने वाला हर लखनऊवा सर्दियों के मौसम में मक्‍खन मलाई का टेस्ट लिए  बिना नहीं रह पता है, क्योंकि, नाम तो है मक्खन मलाई लेक़िन इसमें न तो पूरी तरह से मक्खन होती है ना मलाई, दरअसल, इसमें दूध की झाग, जिसे खूब ढंग से फेंटा जाता है, और फिर इसे दबा कर गाढ़ा किया जाता है।

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इसके बाद तो इसकी भीनी सी खुश्बू लोगों को अपनी तरफ बिना बुलाये खींच लाती है, सुबह होते ही चौक "पुराना लखनऊ" के पास गोल दरवाज़े के पास सैकड़ों की तादाद में मक्‍खन-मलाई बेचने वालों की लाइन लग जाती है, वहीं कुछ लोग इसे बेचने के लिए लखनऊ की गलि‍यों में इसे बेचने के लिए साइकिल पर बाल्‍टी रखकर निकल पड़ते हैं।

तो इस तरह बनाई जाती है मक्‍खन मलाई :

लखनऊ की नवाबी व्यंजनो की रेसिपी की तरह इसे बनाने का एक तजुर्बा और तरीका, वक़्त, सब्र तीनों ज़रूरत होती है, दरअसल एक जानकारी के अनुसार पहले भैंस के दूध लाया जाता हैं फिर शुरुआत में हल्का-सा फ्रेश सफेद रंग का मक्खन मिक्स कर देते हैं, उसके बाद ठंडा करने के लिए रात भर के लिए खुले में रख कर छोड़ दिया जाता है।

रात के 2 से 3 बजे शुरू होता है काम :

अब चार से पांच घंटे का वक़्त बीत जाने के बाद यह ठंडा हो जाता है, मतलब इसे रात के दो से तीन बजे इसके मिक्स करने का प्रोसेस शुरू किया जाता है, जैसे-जैसे इसका झाग ऊपर उठने लगता है, तो उसे दबाये जाने का काम भी करते रहते हैं, ये प्रोसेस तक़रीबन कई बार रिपीट किया जाता है, जब काम भर की मात्रा में झाग इकट्ठा जाता है फिर इसे बाहर ओस में रखा दिया जाता है।

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इन चीज़ों का मिक्सचर डालते है :

इसे खुले में रखने की एक बड़ी वजह सुबह की ओस नम रहती है, नमी के कारण से झाग फूलने लगते हैं, ऐसे मक्खन का हल्‍का रूप और मुंह में मेल्ट होने वाला मिक्सचर रेडी हो जाता है, और फिर आखिर इलायची, चीनी केवड़ा वगैरह डाला जाता है, अब समय के अभाव की वजह सर ओस गिरने न इंतज़ार न करते हुए बर्फ का इस्‍तेमाल किया जाता हैं जिससे जल्द से जल्द तैयार हो जाए।

मलाइय्यो भी कहा जाता है :

मक्खन मलाई का इजात कब कहाँ और किसने किया, ख़ैर इसकी जानकारी को पक्की तौर पर तो कोई नही जानता, हालांकि कुछ लोग यह भी मानते है कि बादशाह अकबर के शाही किचन से इसका ईजाद हुआ, हालांकि लखनऊ के पुराने बाशिंदे इसे "निमिश" के नाम से भी जानते हैं, इसके अलावा उन्नाव, कानपुर जैसे शहरों में इसे ‘मलाइय्यो’ नाम से भी मक्खन मलाई खूब बिकती है।

दोस्तों, भले ही आप लखनऊ के न हों मगर जब भी आएं इसे टेस्ट करना बिलकुल न भूलें, क्योंकि एक ट्रिप यात्री को किसी भी शहर की खूबसूरती या फिर खाने पीने की चीज़े ही याद दिलाती है, इसलिए एक बार तो आना बनता है, तो दोस्तों यह पोस्ट आपको कैसा लगा कॉमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं, साथ ही पसंद आया हो तो इसे अपने साथियों और सोशल मीडिया पर शेयर करना बिल्कुल न भूलें।

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